इनको नहीं भा रहा है भोपाल

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(सनव्वर शफी)  चारों तरह हरियाली और झीलों का शहर कहा जाने वाला भोपाल प्रवासी पक्षियों को रास नहीं आ रहा है, जिसकी वजह से हर साल आने वाले प्रवासी पक्षियों की संख्या निरंतर कम होती जा रही है और यह आंकड़ा इस बार 25 फीसदी तक पहुंच गया है. दरअसल मौसम की बेरुखी और इंसानी दखलअंदाजी की वजह से प्रवासी पक्षियों ने भोपाल से अपना मुंह मोड़ लिया है. जानकारों का कहना है हर साल करीब दस फीसदी प्रवासी पक्षी कम होते जा रहे है. पांच साल पहले तक तो शहर में बड़े-बड़े झुंड प्रवासी पक्षी के दिखाई दे जाते थे, लेकिन इस बार जल स्तर का कम होने और माइग्रेशन साइट पर लोगों की आवजाही बढ़ जाने से प्रवासी पक्षियों ने अपना रुख कहीं और कर लिया हैं.
पक्षी विशेषज्ञों का कहना है कि, यदि बड़ा तालाब सूख जाता है, तो भी प्रवासी पक्षी नहीं आएंगे और यदि अगर बारिश ज्यादा हो जाती है तो भी प्रवासी प्रक्षियों की संख्या में असर पड़ेगा. क्योंकि बर्डस को तैरने के लिए उचित मात्रा में पानी और भोजन की आवश्यकता होती है. इसलिए बारिश भी इतनी ही होने चाहिए कि यह तैर भी सकें और पर्याप्त मात्रा में भोजन भी मिल सके. पक्षी विशेषज्ञों के अनुसार यदि जल स्तर इस तरह कम होता रहा तो पूरी तरह से माइग्रेटरी रुकने की संभावना है, ऐसा होने से शहर की डायवर्सिटी पर असर पड़ेगा. पक्षी विशेषज्ञों का मानना है कि राजा भोज सेतू, बोट क्लब और सैर सपाटा जासे स्थानों पर दिनभर लोगों आवजाही की वजह से प्रवासी पक्षियों की संख्या में कमी आई है.

साइबेरिया, यूरोप और साउथ एशिया से आते हैं पक्षी
भोपाल बर्डस संस्था के मोहम्मद खालिद ने बताया कि, इस बार शहर में आने वाले प्रवासी पक्षियों में ब्लू टेल बीईटर, क्रिसेट टेल जकाना, दूधराजा की संख्या बहुत कम नजर आई, लेकिन पहली बार फायर केट टिट पक्षर यहां दिखा था. शीत ऋतु में प्रदेश में आने वाले प्रवासियों में रोजी, पेलिकन, वुड सेंडपाइपर, वुडपीकर, युरेशियन कबूतर, साइबेरियन क्रेन, ग्रेटर फ्लेमिंगो, पीली वागटेल, यूरेशियन टील, सफेद वागटेज, उत्तरी शॉवेलर, चित्तीदार सैंडपाइपर प्रमुख हैं. गर्मी में यहां कूकूस, काम्ब डक, एशियाई कोयल, यूरोपियन सुनहरी, फ्लायकेचर, ओरियोल, नीली पूंछ वाली मक्खी आदि पक्षी आते है. ये पक्षी हिमालय, साइबेरिया, यूरोप और साउथ एशिया से यहां आते है.

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समय से पहले कर जाते है पलायन
पक्षी और पर्यावरण विशेषज्ञ डॉ. सुरेश वाघमारे ने बताया कि, पिछले चार-पांच सालों में लोगों में पक्षियों के प्रति जागरुकता और रूझान दोनों ही बढ़ी हैं. लेकिन दो वर्षों से बारिश बहुत कम मात्रा में होने से भी प्रवासी पक्षियों की संख्या घटी है. पिछले पांच साल में प्रवासी पक्षियों की संख्या में 25 फीसदी तक की कमी आई है. इसकी वजह ध्वनि, वायु व तालाब में होने वाले प्रदूषण से मौसम में भी बदलाव आया और पक्षियों की आमद, यहां रूकने व परिवार को बढ़ाने में कमी आ रही है. साथ ही इस बार कुछ ऐसी भी प्रजातियां थीं, जो यहां आई तो जरूर लेकिन जल्दी ही यहां से पलायन कर गई.

हर साल आते है 200 प्रजातियों के पक्षी
पक्षी विशेषज्ञ श्रीराम माहेश्वरी बताते है कि शहर में हर साल 200 से ज्यादा प्रजातियों के पक्षी आते हैं. सर्दी के मौसम से ज्यादा आते है लेकिन 20 प्रजातियों के पक्षी गर्मी में भी आते हैं. लेकिन पिछले पांच साल में प्रवासी पक्षियों के शहर में आने की संख्या पर नजर डालें तो औसत रूप से प्रजाति और संख्या में कुछ अधिक ही अंतर नहीं आया. परिंदों को सुरक्षित और प्राकृतिक वातारण चाहिए. यदि प्रवासी पक्षियों को आमंत्रित करना है तो इन स्थानों को प्राकृतिक परिवेश में ही रखना होगा. यदि हमने इसको फैंसी बनाने की कोशिश की तो स्थिति उलट जाएगी. यदि प्रवासी और स्थानीय प्रक्षियों की आमाद, तादाद व जीवनचक्र को बरकरार रखना है, तो इनकी हैबीटेट पर ध्यान देना होगा.

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