इस गांव में 2 साल से क्यों नहीं आई बारात, सोचने पर मजबूर कर देगी वजह

पिपलधार/विदिशा | एक तरफ हमार देश डिजिटल हो रहा है तो वहीं दूसरी तरफ इस देश के कई ग्रामीण क्षेत्रों में अंधविश्वास, रूढ़िवादिता, सामाजिक कुरुतियां और आडंबर की चादर ओढ़ रखी है. बिल्कुल मध्यप्रदेश का एक ऐसा गांव है जहां 2 साल से गांव में किसी लड़की की बारात नहीं आई, लेकिन लड़के की बारात गांव से जरुर जाती है. और अगर ग्रामीण अपनी बेटी की शादी करते है तो उन्हे किसी शहर या अपने किसी परिचित के गांव जाना पड़ता है.इसके पीछे वजह सिर्फ इतनी है की, 2 साल पहले गांव के किसी पण्डित की बाइक से एक गाय की मौत हो गई थी. हालांकि इसके बाद उस पण्डित ने गंगा पूजन कर दिया था. लेकिन रुढीवादी सोच और धार्मिक आडंबर के चलते गांव में किसी लड़की की शादी नहीं कर रहे हैं. और गांव को अछूता मान रहे हैं. एक तरह से लछन की तरह देखा जा रहा है.

बता दें कि, पिपलधार नाम का ये गांव विदिशा जिले में आता है. यूं तो ये सभी मूलभूत सेवाओं से संपूर्ण है. और शिक्षा के क्षेत्र में बहुत आगे है लेकिन रुढिवादी सोच और कुरुतियों के चलते आज अपनी मूल पहचान को खो रहा है.
ऐसा नहीं है कि, ग्रामीणों ने इस बारे में सोचा नहीं है, कुछ ग्रामीणों का कहना है कि, अगर इस गांव में सामूहिक विवाह सपन्न किया जाए तो यहां से लड़कियों की शादी की जा सकती है, लेकिन करें तो कौन करे? ग्रामीण कहते है कि, हम क्यों इतना बड़ा पाप अपने सिर लें. इस वजह से कोई भी अपनी बेटी की शादी इस गांव से नहीं कर रहा है.
वहीं इन 2 सालों में प्रशासन को मामले की भनक तक नहीं लगी. और प्रशासन मामले से अंजान है. अगर प्रशासन पहल करे, तो यहां मुख्यमंत्री कन्यादान योजना का आयोजन करा सकता है. जिससे ग्रामीणों की समस्या का समाधान हो जाएगा और गांव में फिर से बेटियों की ढोली उठने लगेगी. नहीं इस गांव का नाम इतिहास में दर्ज हो जाएगा.
इन सामाजिक कुरीतियों की जड़ें इतनी गहरी हैं कि इन्हें सामूहिक प्रयासों द्‌वारा ही दूर किया जा सकता है. केवल सरकार या प्रशासन इसे रोकने में सक्षम नहीं है. इसके लिए सभी संप्रदायों, धार्मिक संस्थानों तथा समाजसेवियों को एकजुट होकर प्रयास करना होगा. तभी देश में व्याप्त सामाजिक कुरीतियों से मुक्ति की कल्पना की जा सकती है.
हमारी सामाजिक कुरीतियाँ राष्ट्र के विकास की अवरोधक हैं. ये सामाजिक विषमताएँ तथा उनसे उत्पन्न कुरीतियाँ तब तक दूर नहीं की जा सकतीं जब तक कि हम उनके मूल कारणों तक नहीं पहुँचते.

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