आगामी 5 अगस्‍त को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अयोध्‍या श्रीराम मंदिर के नींव पूजन करने वाले हैं। इसके मुहूर्त पर शंकराचार्य स्‍वरूपानंद सरस्‍वती द्वारा सवाल उठाये जाने से जहां एक नया विवाद खड़ा हुआ, वहीं ज्‍योतिष की दुनिया में अकसर उपेक्षित सा रहने वाला अभिजित नक्षत्र एक बार फिर से चर्चा में आ गया है। क्‍योंकि नींव पूजन अभिजित मुहूर्त में ही होने वाला है।

● शंकराचार्य द्वारा 5 अगस्‍त के मुहूर्त को अशुभ बताए जाने के बाद श्रीराम मंदिर न्‍यास की ओर से बताया गया कि नींव पूजन का कार्यक्रम अभिजीत मुहूर्त में इसलिए रखा गया है, क्‍योंकि खुद भगवान श्राम का जन्म अभिजीत मुहूर्त में ही हुआ था। यह तो रही मुहूर्त को लेकर उठे विवाद की बात। आइये अब आते हैं कि आखिर यह अभिजित मुहूर्त या अभिजित नक्षत्र होता क्‍या है? इसकी खासियत क्‍या है? और इसे लेकर इतना विवाद क्‍यों है?

● दरअसल, उत्‍तर भारतीय ज्‍योतिष परंपरा में आमतौर पर 27 नक्षत्र माने गए हैं, पर इनके अलावा एक 28वें नक्षत्र का भी उल्‍लेख कहीं-कहीं मिलता है। यह 28वां नक्षत्र ही अभिजित नक्षत्र है। उत्‍तर भारतीय ज्‍योतिषीय गणनाओं में तो इसे ज्‍यादा महत्‍व नहीं दिया जाता, पर दक्षिण भारतीय पद्यति में इसे काफी महत्‍वपूर्ण माना जाता है।

● तैतरेय संहिता और अथर्ववेद में 28वें नक्षत्र के रूप में अभिजित का उल्‍लेख मिलता है। इसे उत्तर आषाढ़ और श्रवण नक्षत्रों के बीच स्‍थान दिया गया है, पर इसे पूर्ण तारा मंडल या नक्षत्र नहीं माना गया है। उत्‍तर भारतीय पद्यि‍ति में इसे केवल एक मुहूर्त के रूप में स्‍थान दिया गया है। ठीक उसी तरह, जैसे छाया ग्रह राहु के लिए दिन में एक छोटा सा समय ‘राहु काल’ के रूप में निश्चित कर दिया गया है। ठीक उसी तरह दिन में दो बार दो-दो घड़ी यानी 28-28 मिनट के लिए अभिजित मुहूर्त भी माना गया है।

● अभिजित मुहूर्त प्रतिदिन सुबह 11 बजकर 32 मिनट से लेकर दोपहर 12 बज कर 28 मिनट तक और रात में में 11 बजकर 32 मिनट से लेकर 12 बजकर 28 मिनट तक माना गया है। खगोल शास्त्र में वेगा नाम के तारे को अभिजित की संज्ञा दी जाती है।

● पूर्ण नक्षत्र न माने जाने के बावजूद अभिजित नक्षत्र का वैदिक परंपरा में काफी महत्‍व है। धार्मिक मान्‍यता के मुताबिक श्रीराम और श्रीकृष्‍ण दोनों ही अवतारों का जन्म इसी मुहूर्त में हुआ था। राम का जन्‍म मध्यान्ह अभिजीत में, जबकि कृष्‍ण का जन्‍म अर्धरात्रि अभिजित में हुआ माना जाता है।

● अभिजित नक्षत्र के बारे में एक कथा प्रचलित है। इसके मुताबिक सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी ने स्‍वयं अभिजित नक्षत्र रचना की थी। ब्रह्मा ने अपने द्वारा रची गई शारदा यानी सरस्‍वती से इसी नक्षत्र में विवाह का प्रस्‍ताव रखा था। इसे शारदा ने अस्‍वीकार कर दिया था। इसी से कुपित होकर ब्रह्मा ने अभिजित नक्षत्र को विलुप्‍त कर दिया।

● अपने इस कृत्‍य के चलते खुद ब्रह्मा भी श्रापित हुए और हिन्‍दूू मंदिरों में आमतौर पर ब्रह्मा की पूजा नहीं होती। केवल पुष्‍कर में ही ब्रह्मा का प्राचीन मंदिर मिलता है। माना जाता है कि ब्रह्मा जी ने महज़ कामदेव की परीक्षा लेने के लिए सरस्‍वती से विवाह का प्रस्‍ताव रखा था।

● देश के इतिहास में भी अभिजित नक्षत्र का अत्‍यधिक महत्‍व है। भारत की आजादी और विभाजन की घोषणा भी 15 अगस्‍त 1947 को अर्धरात्रि अभिजित नक्षत्र में ही हुई थी। ज़ाहिर है कि आज़ादी जहां खुशी का मौका था, वहीं विभाजन एक बड़ी त्रासदी बना। इसलिए अभिजित नक्षत्र को लेकर परस्‍पर विरोधी धारणाएं हैं। एक ओर जहां इसे शुभ माना जाता है, वहीं बहुत से ज्‍योतिषी इसे अशुभ भी मानते हैं।

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