मध्यप्रदेश की राजनीति में 15 सालो तक सत्ता पर काबिज रही बीजेपी में इन दिनों संक्रमण काल से गुजर रही है। इसका मुख्य कारण हाल ही में हुए विधानसभा चुनावों में मात्र कुछ ही सीटों के अंतर से हार का मुंह देखना है। लोकसभा चुनाव के प्रत्याशियों के चयन में जिस तरह भाजपा के अंदर विरोधाभास देखने को मिल रहा है वह किसी से छुपा नहीं है दरअसल इसे काँग्रेस का ट्रेंड कहा जाए तो अतिशियोक्ति न होगी। भोपाल लोकसभा सीट के प्रत्याशी को लेकर मचे घमाशान को देखकर तो कुछ ऐसा ही लग रहा है। यहां से बीजेपी के महामंत्री और संगठन पर अपनी मजबूत पकड़ रखने वाले वीडी शर्मा का नाम का विरोध बीजेपी के स्थानीय नेताओं द्वारा होना तो लगभग यह बताता है कि वीडी शर्मा की दावेदारी यही है, हालांकि वह मुरैना से भी चुनाव लड़ने के इच्छुक माने जा रहे है। भाजपा के स्थानीय नेता वर्तमान सांसद जो पार्षद से सीधे सांसद बन गए आलोक संजर को ऐसा लग रहा है कि बिल्ली के भाग्य से एक बार फिर छींक टूट सकता है हांलकि उन्होंने इन पांच सालों में ऐसा कोई काम नहीं किया जो उनकी सांसद रहते उपलब्धि मानी जाए और तो और भाजपा के राष्टीय अध्यक्ष अमित शाह के भोपाल आगमन पर उन्होंने खुद पूछ लिया था कि यहां से सांसद कौन है? तो वही भोपाल महापौर आलोक शर्मा भी अपनी दावेदारी ठोक रहे है अब इन सबसे अधिक हो हल्ला मचा रहे है वरिष्ठ बीजेपी नेता बाबूलाल गौर जिन्हें पार्टी ने लगभग मार्गदर्शक मंडल में डाल रखा है गौर साहब जहां 10 बार के विधायक रहे है तो वहीं बीजेपी की सरकार में मंत्री और मुख्यमंत्री भी बने। विधानसभा चुनाव में पार्टी पर दवाब बनाकर उन्होंने अपनी पुत्रवधु कृष्णा गौर को गोविंदपुरा से टिकिट दिलवाने में कामयाब रहे थे, जबकि संगठन और पार्टी वीडी शर्मा को यहां से टिकिट देना चाहती थी। बाबूलाल गौर अब खुद के लिए टिकिट की दावेदारी कर रहे है और उसके लिए वह एक बार फिर पार्टी पर दवाब बनाते दिख रहे है वह कभी काँग्रेस के पक्ष में बोलते दिखते है तो कभी बीजेपी के अनुशाषित कार्यकर्ता बन जाते है। वही भोपाल के वर्तमान महापौर आलोक शर्मा जिन्हें पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का कट्टर समर्थक माना जाता है वह लोकसभा जाने का सपना सजो रहे है। सूत्रों की माने तो आलोक शर्मा के मेयर रहते उन्होंने खूब धन पीटा उनके अभी तक के कार्यकाल में तीन नगर निगम कमिश्नर बदल चुके है इसके पीछे का कारण नगर निगम में भारी भर्ष्टाचार का होना बताया जा रहा है जिस कमिश्नर ने जांच के लिए कार्यवाही करने की कोशिश की उसका तबादला निश्चित। सूत्र बताते है कि नगर निगम में करोडो के डीजल घोटाला की फ़ाइल बस फ़ाइल ही बनकर रह गई जिसमें महापौर के चहेते अधिकारी भी शामिल थे जिन्हें बीजेपी के सार्वजनिक मंच पर देखा जा सकता और इसी को लेकर विधानसभा चुनाव के दौरान अचार संहिता लगने पर उस अधिकारी को निगम से हटा दिया गया था लेकिन चुनाव बाद फिर वापसी हो गई थी। महापौर आलोक शर्मा ने इन चार सालों में इतना धन कमाया की सूत्र बताते है कि गोवा में उनका एक रिसार्ट भी बन गया है जिसे पार्टनरी में बताया जाता है। खैर आलोक संजर से लेकर आलोक शर्मा और बाबूलाल गौर का पार्टी द्वारा अभी तक नाम तय न होने के पहले ही वीडी शर्मा के खिलाफ मोर्चा खोलना कुछ न कुछ दाल में काला होने जैसा प्रतीत होता है। आखिर इस विरोध के पीछे का असली खिलाड़ी कौन है?
दरअसल वीडी शर्मा अपने छात्र जीवन से ही संगठन से जुड़े और सर्वमान्य जुझारू नेता रहे है। उनकी संगठन क्षमता को देखते हुए ही पार्टी ने उन्हें महामंत्री जैसे दायित्व दिया जिस पर वह खरे उतरे है। लेकिन उनकी यही संगठन पर पकड़ और जनाधार पार्टी नेता के लिए आंख की किरकिरी बनी हुई है। सूत्र कहते है कि स्वमं शिवराज सिंह चौहान नहीं चाहते कि उनके कद का कोई नेता प्रदेश में खड़ा हो जिसकी हर जगह पकड़ हो वीडी शर्मा ऐसी ही पकड़ रखने वाले नेताओं में सुमार है जिन्हें पार्टी संगठन के अलावा संघ भी पसंद करता है। तो अब सवाल यह उठ रहा है कि तो क्या भोपाल लोकसभा से प्रबल दावेदारी की भनक लगते ही शिवराज सिंह चौहान ने उनके नाम को लेकर विरोध करवाना शुरू करवा दिया है जिसको लेकर स्थानीय नेताओं के द्वारा यह नारा दिया जा रहा है कि –

“आलोक” से मिले “आलोक” किया समस्या पर “गौर”
मजबूरी में “संजर” चलेगा पर चलेगा न कोई “और”

यही नहीं भोपाल में बीजेपी के स्थानीय नेता जिसकी भी शह पर एकजुट हुए हो उनका यही कहना है कि आलोक संजर फिर से चलेगा मगर बाहरी उम्मीदवार नहीं। यह सब संघ और संगठन से जुडे नेता का नाम भोपाल से उतारने की आहट के बाद हुआ एका ⁦है और अपनी व्यक्तिगत महत्वकांक्षा।

जबकि जिन वीडी शर्मा का विरोध हो रहा है वह वर्ष 1987 में भोपाल लोकसभा के अंतर्गत आने वाले सिहोर के कृषि महाविद्यालय में पहले बीएससी और फिर एमएससी करते है। भाजपा के अनुशांगिक छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के राष्ट्रीय संगठन मंत्री रहते हुए उनका केंद्र भोपाल रहा जिसके चलते पिछले कई सालों से भोपाल में ही निवास कर रहे हैं। यही नहीं वीडी शर्मा 23 साल तक पूर्णकालिक प्रचारक भी रहे हैं अभी दो वर्ष पहले ही वह इस दायित्व से मुक्त हुए है। लेकिन बाहरी बनाम स्थानी का मुद्दा उठाने वाले भोपाल के बीजेपी नेता अपने गिरेबान में झांककर नहीं देखना चाहते की वह भी भोपाल के नहीं बल्कि बाहरी ही है चाहे फिर बाबूलाल गौर हो जो उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले से आते हैं चाहे फिर वह वर्तमान सांसद आलोक संजर हो जो उत्तर प्रदेश से ही ताल्लुक रखते हैं। विरोध करने वाले भोपाल के महापौर आलोक शर्मा जो कि बुंदेलखंड से आते है लेकिन अपने आपको बर्रुकट भोपाली बताते हैं, या फिर विधायक रामेश्वर शर्मा जो विदिशा जिले से हैं यह सभी अपने आपको भोपाल का स्थानीय बताते है तो फिर लगातार तीन बार से भोपाल लोकसभा में वोट डालने वाले वीडी शर्मा बाहरी कैसे हो गए जबकि वह तो मध्यप्रदेश के भिंड जिले से ही है। लेकिन राजधानी भोपाल में राजनीति करने वाले यह भूल चुके है और दोहरे मापदंड अपनाते हुए स्थानीय बनाम बाहरी को मुद्दा बना रहे है। जबकि खुद पीएम नरेंद्र मोदी गुजरात से आकर उत्तर प्रदेश के वाराणसी से चुनाव लड़ रहे है।
लेकिन वर्तमान सांसद आलोक संजर भी इसी उत्साह में इन स्थानीय नेताओं के साथ हो लिए कि कहीं फिर से उनका भाग्य साथ दे जाए। लेकिन भोपाल के स्थानीय नेताओं का अपने ही पार्टी के नेता के लिए विरोध करना काँग्रेस के छत्रपों वाली राजनीति की याद दिलवाती है जहाँ काँग्रेस एकजुट होकर विधानसभा के चुनाव मैदान में थी और जीत हासिल भी की वही लोकसभा चुनाव में भी काँग्रेस उसी एकजुटता को दोहरा रही है जबकि कैडर बेस पार्टी का दावा करने वाली भाजपा में नेताओं में आपसी भिड़ंत मची हुई है शायद यही सत्ता का दोष है जो सत्ता जाने के बाद भी बीजेपी के सिर से नहीं उतर रहा जिसका परिणाम भोपाल लोकसभा से संगठन के नेता वीडी शर्मा की खिलाफत के रूप में बीजेपी नेताओं में दिख रहा है।

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