गठबंधन की गांठें

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जो विविध शक्तियां नरेंद्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को सत्ता से बाहर करने के लिए प्रयासरत हैं, उन्हें विपक्षी एकता का महत्त्व समझ में आ चुका है। परंतु जम्मू कश्मीर में भाजपा और पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) का अलगाव यह दिखाता है कि अक्सर गठबंधन बनाना आसान होता है लेकिन उसे बरकरार रखना मुश्किल। पहला राष्ट्रीय गठबंधन सन 1971 में हुआ था जब पांच दलों ने मिलकर विभाजित कांग्रेस के इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाले धड़े का मुकाबला किया। इंदिरा का कहना था कि यह ‘महागठबंधन’ उन्हें हटाने पर केंद्रित था जबकि उनका ध्यान गरीबी हटाने पर था। मतदाताओं ने उनकी बात मान ली। उन्हें कुल मतों में 44 फीसदी की हिस्सेदारी मिली जबकि गठबंधन में शामिल दलों को केवल 24 फीसदी मत मिले। लोकसभा में भी इंदिरा को दो तिहाई सीटों पर जीत मिली।
परंतु दूसरी बार मामला इसके उलट रहा। आपातकाल के अनुभव के बाद उत्तर भारत के अधिकांश मतदाता कांग्रेस के खिलाफ खड़े किसी भी उम्मीदवार को वोट देने के लिए तैयार थे। उन आम चुनावों में कांग्रेस की मत हिस्सेदारी घटकर 35 फीसदी पर आ गई जबकि सन 1971 के गठबंधन के समान दलों से बनी नई नवेली जनता पार्टी को 43 फीसदी मत मिले। उसे कांग्रेस की 153 के मुकाबले तकरीबन दोगुनी लोकसभा सीट मिलीं। पार्टी ने 298 सीटों पर जीत हासिल की। इसके बावजूद यह सरकार आधा कार्यकाल भी पूरा नहीं कर पाई। हाल के वर्षों में कांग्रेस के नेतृत्व वाली दो गठबंधन सरकारों ने कार्यकाल पूरा किया। मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्रित्व वाली ये सरकारें नीतिगत पंगुता और भ्रष्टïाचार का पर्याय बन गई थीं क्योंकि गठबंधन के कुछ साझेदार दलों ने मनमाने ढंग से काम किया।
अल्पमत सरकारों ने गठबंधन की तुलना में बेहतर प्रदर्शन किया है। इंदिरा गांधी की सन 1969 के बाद की सरकार, नरसिंह राव की सरकार और अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार, सभी अल्पमत में थीं लेकिन बची रहीं और उन्होंने बहुत अच्छा काम किया। ये उदाहरण बताते हैं कि सन 2019 के आम चुनाव में और उसके बाद विपक्षी गठबंधन की संभावनाएं बहुत उज्ज्वल नहीं हैं। सरकार की लोकप्रियता में कमी आई है लेकिन प्रधानमंत्री का कद अभी भी काफी ऊंचा है। ठीक 1971 की तरह। हां, अगले वर्ष अगर कोई विपक्षी गठबंधन बनता है तो वह सन 1971 से बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद कर सकता है लेकिन वह सन 1977 का प्रदर्शन दोहरा नहीं पाएगा। इसलिए कि सन 1977 में मतदाताओं को कांग्रेस को हटाने के लिए किसी अन्य वजह की जरूरत नहीं थी। विपक्षी दलों को केवल अपने प्रत्याशी खड़े करने थे। आज भी कुछ मतदाताओं के लिए ऐसी स्थिति हो सकती है लेकिन सन 1977 को दोहराया नहीं जा सकता है क्योंकि उस वक्त कांग्रेस को पूरे उत्तर भारत में एक सीट छोड़कर प्रत्येक पर पराजय का सामना करना पड़ा था। यानी 2019 में 1977 का दोहराव नहीं होगा। अगर जीत मिलती भी है तो वह आसान नहीं होगी। बचाव की भावना ही इन अलग-अलग दलों को एक साथ लाई है और कुछ नहीं। इनके व्यक्तित्व आपस में मेल नहीं खाते। मतदाता आधार के मामले में भी इनमें काफी घालमेल है।
हर नेता अपने आपको प्रधानमंत्री पद का दावेदार मानकर चल रहा है। भाजपा को इन सब बातों का फायदा मिल सकता है। ठीक वैसे ही जैसे कांग्रेस को सन 1979 में जनता पार्टी और 1990 में वीपी सिंह के जनता दल में फूट से मिला था। राज्यों की हकीकत भी दिलचस्प है। कांग्रेस दिल्ली में आम आदमी पार्टी के साथ रिश्ता नहीं रखना चाहती। महाराष्ट्र में वह शिवसेना के साथ नहीं आ सकती। पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस वाम दलों के लिए कोई गुंजाइश नहीं छोडऩा चाहती। आंध्र प्रदेश में तेलुगू देशम कांग्रेस को जरा सी जगह नहीं देगी। संभावना यही है कि महागठबंधन राज्यों के नेताओं का जबरदस्त मोलभाव वाला संघ होगा जहां हमेशा तनाव रहेगा। अहम बात यह है कि सरकार में शामिल दल साथ बने रहते हैं, अगर उनको पता हो कि वे अपने दम पर गठबंधन से निकलकर सरकार नहीं बना सकते। इसमें प्रमुख दल की मजबूती की अहम भूमिका होती है। वह स्वाभाविक तौर पर समूह का नेता और उसे जोड़े रखने वाला होता है। इनके अलावा एक ऐसे नेता की आवश्यकता होती है जो जटिल हालात में भी परिस्थितियों पर काबू रख सके। चूंकि ऐसा नेता भी नहीं है इसलिए इस बात पर दांव होगा कि मोदी विरोधी सरकार बनी भी तो भाजपा-पीडीपी सरकार से ज्यादा नहीं चलेगी। उसके बाद क्या सन 1980 में इंदिरा गांधी की तरह मोदी की भी वापसी होगी?
source – Business standard ( hindi )

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