देश के 12 करोड़ बुजुर्गों यानी वरिष्ठ नागरिकों की सरकारें अनदेखी करती रही हैं। सावधि जमा (एफडी) की ब्याज दर में लगातार गिरावट इस बात के संकेत हैं। अब दो से तीन साल तक के डिपाजिट पर मात्र 6.4 प्रतिशत ब्याज दिया जाएगा। देश में 4.10 करोड़ बुज़ुर्ग खातेदार हैं, जिनके 14 लाख करोड़ रुपए बैंकों में एफडी के रूप में जमा है। एक ऐसी अर्थव्यवस्था में, जिसमें आने वाले दिनों में ब्याज दरें काफी कम होने के संकेत हैं, बुजुर्गों की अनदेखी (सरकार इनके लिए मात्र 0.5 फीसदी ज्यादा ब्याज देती है और राष्ट्रीय बचत योजना में केवल 15 लाख रुपए की सीमा भी है) इस तथ्य से स्पष्ट है कि जहां हर किसान को प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि के रूप में 6000 रुपए हर वर्ष दे रही है वहीं कई राज्य सरकारें उन्हें खुश करने के लिए अलग से अनेक मनमोहक योजनाओं के तहत 6500 से 10,000 रुपए तक दे रही हैं। दुनिया के सभी कल्याणकारी राज्यों में एक सर्वमान्य सोच है कि देश का सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) अगर बढ़ रहा है तो सामाजिक सुरक्षा योजनाएं ज्यादा शुरू की जाएं खासकर उनके लिए जो नहीं कमाते हैं। भारत में 1961 में कुल जनसंख्या में बुजुर्गों का प्रतिशत मात्र 5.6 था जो 2011 की मतगणना में 8.6 पाया गया और आज वह 11 प्रतिशत तक पहुंच गया है। इनमें शहरी बुजुर्ग मात्र 29 प्रतिशत है, जबकि ग्रामीण बुजुर्ग 71 प्रतिशत। 1961 में इस वर्ग का ‘निर्भरता अनुपात’ (दूसरे के सहारे रहना ) भी आज करीब 16 हो गया है यानी हर छठवें वृद्ध या हर तीसरे परिवार के वृद्ध दंपति को सहारे की जरूरत है। इस वर्ग की दो अक्षमताएं सबसे आम है- चलने में दुश्वारी और दिल की बीमारी। आर्थिक मजबूती कम होने पर सगे भी साथ छोड़ देते हैं और इलाज़ का खर्च बेतहाशा बढ़ता जाता है। लेकिन सरकार ने जहां अपने कर्मचारियों के लिए दिवाली गिफ्ट के रूप में महंगाई-भत्ते में पांच प्रतिशत का इजाफा किया वहीं निजी क्षेत्रों में नौकरी से रिटायर या गांव के बुजुर्ग के एक मात्र सहारे ‘ब्याज’ पर फिर चाकू चलाने की तैयारी है। बैंक के एक बड़े अधिकारी के अनुसार महंगाई दर भी कम हो रही है इसलिए बुजुर्गों को ज्यादा दिक्कत नहीं होगी। उन्हें शायद यह नहीं मालूम कि दवा और इलाज का खर्च किसी सरकारी नियंत्रण में नहीं है और घर में मूल्य सूचकांक देखकर नहीं, ‘बाबूजी’ की सालाना आमदनी देखकर सेवा होती है।

नोट – यह सम्पादकीय दैनिक भास्कर से ली गयी है !!

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