बाढ़ का कहर

0
51

इस बार महाराष्ट्र, गुजरात से लेकर कर्नाटक और केरल तक में बाढ़ से जो तबाही मची है उससे यह तो साफ है कि मौसम विभाग की भारी बारिश की चेतावनी के बावजूद सरकारों ने बचाव के शायद ही कोई पर्याप्त उपाय पहले से किए हों। पिछले चार दिनों में इन राज्यों में हुई भारी मानसूनी बरसात ने ऐसा कहर बरपाया कि ज्यादातर जगहों पर राष्ट्रीय राजमार्ग तक पांच-छह फीट पानी में डूब गए। गांव के गांव जलमग्न हैं। हल्दी की खेती के लिए मशहूर महाराष्ट्र के सांगली जिले की हालत तो बहुत खराब है। इस जिले के कई गांव बीस-बीस फुट पानी में डूब गए हैं। इन राज्यों में बाढ़ से मरने वालों का सरकारी आंकड़ा दो सौ से ऊपर है। बेघरों की तादाद तो लाखों में है। सांगली और कोल्हापुर जिलों में बाढ़ के पानी की निकासी बढ़ाने के लिए कर्नाटक ने अलमाटी बांध से भारी मात्रा में पानी छोड़ा है। गुजरात में नर्मदा नदी पर बने सरदार सरोबर बांध के तीस में से छब्बीस गेट खोलने पड़ गए। हालत यह है कि केरल के चौदह, कर्नाटक के अठारह, महाराष्ट्र के ग्यारह और गुजरात के सात जिले भयानक बाढ़ की चपेट हैं और इन जिलों में रेड अलर्ट जारी किया चुका है। कुछ इलाके तो ऐसे हैं जहां पहली बार बाढ़ आई है। हालांकि सभी सरकारों ने बचाव और राहत कार्य शुरू तो किए हैं लेकिन वे ऊंट के मुंह में जीरा साबित हो रहे हैं। ऐसे में ज्यादातर बाढ़ग्रस्त इलाकों, खासतौर से ग्रामीण इलाकों में लोग बाढ़ के पानी में फंसे हैं।

ऐसा नहीं है कि बाढ़ कोई अनायास ही आई हो। मौसम विभाग ने भारी बारिश को लेकर पहले ही चेतावनी जारी कर दी थी। इस बात का अनुमान शायद सरकार को नहीं रहा होगा कि लगातार मूसलाधार बारिश से नदियां उफन कर बड़े इलाकोें में फसलों को अपनी चपेट में ले लेंगी। हालात इसी से बिगड़े। सांगली में तो पांच-छह घंटे की भारी बारिश में समंदर जैसे हालात बन गए। अभी समस्या यह है कि ज्यादातर राज्यों में लोगों को बाढ़ ग्रस्त क्षेत्रों से सुरक्षित निकालने का भी बंदोबस्त नहीं हो पाया है। जाहिर है राज्यों के पास बाढ़ जैसी आपदा से निपटने के स्थायी और पर्याप्त इंतजाम नहीं हैं।

हालांकि एनडीआरएफ की टीमें लगी हैं लेकिन पानी में फंसे लोगों की तादाद लाखों में है। नौ सेना और वायुसेना के हेलिकॉप्टर इन इलाकों में खाने के पैकेट और दवाइयां गिरा रहे हैं, लेकिन सबसे ज्यादा बड़ा खतरा पानी में फंसे लोगों की जान का है। असम के तैंतीस जिले बाढ़ की चपेट में हैं और पिछले चार दशकों में वहां पहली बार इतनी भयानक बाढ़ आई है। राज्य में 1980 में बाढ़ नियंत्रण बोर्ड बनाया गया था लेकिन आज तक सरकार ने ऐसे कोई स्थायी उपाय नहीं किए जो राज्य को हर साल आने वाली बाढ़ से बचा सकें। बिहार के भी कई जिले बाढ़ की चपेट में आ चुके हैं। समस्या यह है कि हम पिछली घटनाओं से कोई सबक नहीं लेते। पिछले साल केरल को बाढ़ के जिस विकराल रूप का सामना करना पड़ा था उससे हमने कुछ नहीं सीखा। सवाल है कि बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदा से निपटने के लिए ठोस योजनाएं क्यों नहीं बनाई जातीं? सरकारें इसे एक फौरी और मौसमी संकट मान कर चलती हैं। इस वक्त ज्यादातर बाढ़ ग्रस्त राज्यों के पास ठोस आपदा प्रबंधन प्रणाली नहीं है। वरना लोग जैसा संकट झेलने को मजबूर हैं वैसा शायद नहीं होता।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here