‘सचिन के हाथ में राजस्थान, गहलोत कर रहे केंद्रीय संगठन में मदद’-अमन शर्मा

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अमन शर्मा| कांग्रेस संगठन में हुए बड़े फेरबदल के तहत जनार्दन द्विवेदी की जगह राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को पार्टी में संगठन महासचिव की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी गयी. गहलोत से गुजरात के एआईसीसी प्रभारी की जिम्मेदारी लेते हुए उन्हें यह महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी गयी है. गहलोत ने गुजरात विधानसभा चुनाव में प्रभारी के तौर पर महत्वपूर्ण भूमिका निभायी थी जिसके कारण इस बार के चुनाव में कांग्रेस के विधायकों की संख्या बढ़ कर 77 हो गयी, जो पहले 61 थी.
अशोक गहलोत को कांग्रेस का संगठन व प्रशिक्षण महासचिव बनाने के बाद कांग्रेस की केंद्रीय राजनीति में उनका कद बढ़ गया है. राजस्थान विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस राज्य में गुटबाजी की आशंका को खत्म करने की पूरी कोशिश कर रही है. पार्टी संगठन में हुए फेरबदल का फैसला राजस्थान कांग्रेस के लिए बहुत अहम है. पार्टी आलाकमान ने एक तरह से सचिन पायलट का रास्ता साफ कर दिया है. पार्टी ने पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के अखिल भारतीय कांग्रेस समिति में जगह दी है मतलब उनको केंद्रीय संगठन में बुलाकर राजस्थान से दूर कर दिया गया है. अशोक गहलोत की तो अब इस नई जिम्मेदारी के साथ उनका राजस्थान की राजनीति से वास्ता नहीं रह जाएगा. गौरतलब है कि राजस्थान कांग्रेस की कमान सचिन पायलट ने उस समय संभाली थी जब 2013 के चुनाव में पार्टी का पूरी तरह से सफाया हो गया था. उस समय राजस्थान के सीएम अशोक गहलोत थे.अशोक गहलोत राजस्थान में लोकप्रिय नेता के तौर पर जाने जाते हैं और उनका राज्य की राजनीति में अच्छा-खासा प्रभाव है. लेकिन कांग्रेस को इसका नुकसान भी पड़ रहा था.
पार्टी के अंदर ही सचिन और अशोक गहलोत खेमा बनता जा रहा था, इसके साथ ही एक तरहसे ये भी संदेश देने की कोशिश की गई है कि पार्टी अब युवाओं को तरजीह दे रही है.
सीएम पद की दावेदारी कई जताते हैं लेकिन मुख्य टक्कर अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच ही है. दोनों ही जानते हैं कि दोनों के एक जगह रहते दोनों में से कोई एक ही मुख्यमंत्री बन सकेगा. एक को बाहर किए बिना दूसरा मुख्यमंत्री नहीं बन सकता. इसीलिए दोनों ही खेमे एक दूसरे को अपनी-अपनी ताकत का अहसास कराने में पीछे नहीं रहे हैं.विश्वेंद्र सिंह ने नेताओं से हाथ खड़े करवाकर ये कहलवाया कि अगले मुख्यममंत्री के रूप में सचिन पायलट को पूरा समर्थन दिया जाएगा. तब गहलोत गुट ने ऐसे हालात बना दिए कि, राजस्थान प्रभारी गुरुदास कामत को न सिर्फ बाहर जाना पड़ा बल्कि राजनीति तक छोड़ने का ऐलान करना पड़ा. ये अलग बात है कि बाद में उन्होने ‘अंतरात्मा’ की आवाज पर अपना फैसला बदल दिया.
राजस्थान से बाहर गहलोत की लगातार कामयाबी पायलट खेमे में खलबली मचा रही थी उपचुनाव के नतीजों ने पहली बार पायलट को मुस्कुराने का मौका दे दिया. इन उपचुनावों में जीत ने कम उम्र के पायलट की छवि को एक जिम्मेदार और मुख्यमंत्री पद के लायक उम्मीदवार की छवि में बदल दिया. हाईकमान के सामने ये बात भी पहुंचाई गई कि किस तरह गहलोत के असहयोग के बावजूद पायलट ने अपनी रणनीति और कौशल से कांग्रेस के जहाज को पार पहुंचाया.अशोक गहलोत का कद अब इतना बढ़ा दिया गया है कि मुख्यमंत्री पद उसके आगे नैतिक रूप से मायने नहीं रखता. एक तरह से गहलोत अब कांग्रेस में सोनिया और राहुल गांधी के बाद तीसरे नंबर के नेता हो गए हैं. ऐसे में 7 महीने बाद कांग्रेस अगर राजस्थान में जीत जाती है तो इतना बड़ा पद छोड़कर एक राज्य का मुख्यमंत्री बनने का फैसला करना उनके लिए जिंदगी की सबसे बड़ी दुविधा बन कर रह जाएगा. निश्चित रूप से वे चाहकर भी ऐसा नहीं कर पाएंगे.

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