🇮🇳 राष्ट्र-गान, गीत गाने पर फतवा,किसकी मजाल ?

76 साल से यही चला आ रहा है। वंदे मातरम कहने पर आपत्ति, फतवा..इन फतवों से इतनी दुर्गंध आ रही है कि पूरे देश में गंदगी फैल रही है. ये साजिश इस्लाम की नहीं है बल्कि उसकी नाजायज औलाद की है..सच्चा इस्लामिक तो हर रोज वंदे मातरम और जनगणमन गाता है,लेकिन धर्म और राजनीति की इस मंडी में उसकी आवाज कहीं दब गई है..टीवी पर चार कट्टर मुल्लाओं को बैठाकर हवा दी जा रही है.यही दूसरे भी कर रहे। शरारती तत्व धार्मिक भावनाओं को भडका रहे हैं। हिन्दू-मुस्लिम भाई भाई की जगह दुश्मन बन रहे हैं।
दरअसल मदरसों में राष्ट्रगान गाने के विरोध में फतवा जारी किया गया है..सन् 1947 में 300. मदरसे थे..1988 में 2801 हुए.2002 में इनकी संख्या बढकर 9800 हो गई और अब 2017 में 35000 मदरसें हैं .जहां मजहबी तालीम दी जाती है..फिर राष्ट्रगान शरीअत के खिलाफ कैसे हुआ..जबकि मोलवी और काजियों के बच्चे अच्छे स्कूलों में पढकर हर रोज वंदे मातरम और राष्ट्रगान गा रहे हैं..वो काफिर नहीं हैं ?
शर्म आती है तुम्हारी सोच पर ..दरअसल ये साजिश इस्लाम को मानने वालों को भटकाने की है..बरेली के उस फतवाधारी को तो तत्काल जेल के अंदर कर ही देना चाहिए था।
कैसे दूं मै बधाई ?
हर रोज सैकड़ो महिलाएं ही नही मासूम बच्ची दरिन्दों का शिकार हो रही हैं। देश को चलाने देश को बर्बाद कर रहे हैं। ये गुलामी मृत्यु तुल्य कष्ट दे रही है।

पत्रकार नितिन दुबे के फेसबुक वॉल से 

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